वोह एक एहसास

वोह एक एहसास
न कभी कोई शर्त  रखी ,
न कभी कोई वादा किया,
न रोज़ रोज़ हमने की लड़ाई,
न एक-दूसरे पर कभी कोई हक जताई  /
 
 
याद  भी नहीं क्या थी वोह बातें ,
याद  भी नहीं क्या था वो मज़ाक ,
याद भी नहीं किस बात पर की लड़ाई,
याद है, तो है , बस वो एक एहसास /
 
 
 
पहले भी थी घंटों तक ख़ामोशी ,
अब भी है घंटों  की ख़ामोशी,
पर पहले ख़ामोशी में थे लाखों लफ्ज़ छिपे ,
अब ख़ामोशी में है मीलों की दूरी  छिपी/
 
 
मुँह से अब जो लफ्ज़ निकले,
दूरिया  बढ़ाना कोई इनसे सीखले ,
खुशियाँ और हँसी थी आँखों में कल ,
आज  इनमें है अश्रु जल/
 
 
रोज़  कानों में जाती हैं हज़ारो आवाज़े ,
जिनके कुछ खट्टे- मीठे  से हैं अंदाज़ ,
सुना-अनसुना करते  है रोज़  कई  नाम ,
पर तुम्हारे नाम  से रुक जाता है मेरा सारा काम /
 
 
मन  करता  है  तेरे नाम  को  अनसुना कर पाऊ , काश !
वह एहसास  भी तो नहीं हो पा रहा है नाश !
तुम  वहा कर रहे हो मस्ती , शायद ,
या फिर तुम्हारा  भी है यहीं हाल ?
 
 
 याद  भी नहीं क्या थी वोह बातें ,
याद  भी नहीं क्या था वो मज़ाक ,
याद भी नहीं किस बात पर की लड़ाई,
याद है, तो है , बस वो एक एहसास /
 

-Dhanya Purushothaman

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